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Diwali 2026 पर शॉपिंग का बजट घटाएंगे भारतीय! शहरों में फेस्टिव खर्च 6% गिरकर ₹1.97 लाख करोड़ रहने का अनुमान

On: October 25, 2026 3:58 PM
Diwali

Diwali और दूसरे त्योहार आते ही घरों में नई खरीदारी की तैयारी शुरू हो जाती है। कोई परिवार के लिए नए कपड़े खरीदता है, तो कोई घर के लिए टीवी, फ्रिज या नया स्मार्टफोन लेने की योजना बनाता है। कई लोग त्योहारों पर घूमने जाने और अपनों को उपहार देने के लिए भी अलग से बजट रखते हैं। लेकिन इस साल त्योहारों की रौनक के बीच लोग अपने खर्च को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क नजर आ रहे हैं।

एक नए सर्वे के मुताबिक, 2026 में भारत के शहरी परिवारों का कुल फेस्टिव खर्च पिछले साल के मुकाबले 6 प्रतिशत कम रहने का अनुमान है। LocalCircles के Mood of the Consumer सर्वे के अनुसार, इस साल शहरी भारत में त्योहारों के दौरान गैर-जरूरी खरीदारी पर कुल खर्च लगभग ₹1.97 लाख करोड़ रह सकता है। 2025 में यह अनुमान ₹2.10 लाख करोड़ था। यानी इस बार परिवार खरीदारी की योजना तो बना रहे हैं, लेकिन अपने बजट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

इस सर्वे में एक और दिलचस्प बात सामने आई है। ज्यादातर परिवारों की पसंद में कपड़े, जूते और फैशन से जुड़ी चीजें सबसे ऊपर हैं, जबकि बड़ी खरीदारी करने वाले ग्राहकों की संख्या सीमित दिखाई दे रही है। महंगाई, घरेलू खर्च और बचत को लेकर चिंता के बीच यह बदलाव बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण है। आइए समझते हैं कि इस साल शहरी परिवार कितना खर्च करने वाले हैं, उनकी खरीदारी की प्राथमिकताएं क्या हैं और आखिर फेस्टिव सीजन में खर्च घटने की वजह क्या है।

2026 में फेस्टिव शॉपिंग पर कितना खर्च करेंगे शहरी परिवार?

LocalCircles के सर्वे के अनुसार, इस फेस्टिव सीजन में शहरी भारतीय परिवार गैर-जरूरी खरीदारी पर औसतन करीब ₹20,000 खर्च कर सकते हैं। इसी सर्वे में सामने आए खर्च के इरादों के आधार पर संस्था ने कुल शहरी फेस्टिव खर्च ₹1.97 लाख करोड़ रहने का अनुमान लगाया है। यह पिछले साल के ₹2.10 लाख करोड़ से 6 प्रतिशत कम है।

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यह गिरावट इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2025 में शहरी परिवारों का अनुमानित फेस्टिव खर्च 2024 के ₹1.85 लाख करोड़ से बढ़कर ₹2.10 लाख करोड़ हो गया था। सितंबर 2025 में लागू GST दरों में कटौती ने त्योहारों के आसपास खरीदारी को बढ़ावा दिया था। इस साल वैसा ही टैक्स आधारित प्रोत्साहन नहीं है, जबकि महंगाई और उधार लेने की लागत परिवारों के बजट पर दबाव डाल रही है।  हालांकि, खर्च में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि लोग त्योहार मनाना छोड़ रहे हैं। सर्वे से संकेत मिलता है कि बहुत से परिवार इस बार भी खरीदारी करेंगे, लेकिन वे अपनी जरूरतों और बजट के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

57% परिवार करेंगे खरीदारी, 31% ने बनाया खर्च न करने का प्लान

सर्वे में शामिल शहरी परिवारों में से 57 प्रतिशत ने त्योहारों के दौरान गैर-जरूरी चीजों पर खर्च करने की संभावना जताई। वहीं, 31 प्रतिशत परिवारों ने कहा कि वे इस बार ऐसी खरीदारी नहीं करेंगे। कुछ परिवार अभी यह तय नहीं कर पाए हैं कि त्योहारों पर कितना खर्च करना है।  यह आंकड़ा बताता है कि त्योहारों के दौरान खरीदारी का उत्साह हर परिवार में एक जैसा नहीं है। जिन परिवारों के पास अतिरिक्त बजट है, वे कपड़े, घरेलू सामान या यात्रा पर खर्च कर सकते हैं। दूसरी ओर, जिनके मासिक खर्च पहले से बढ़े हुए हैं, वे गैर-जरूरी खरीदारी को टालना पसंद कर सकते हैं।

घर का किराया, बच्चों की फीस, राशन, बिजली-पानी के बिल और अन्य जरूरी खर्च पूरे करने के बाद ही ज्यादातर परिवार खरीदारी के लिए अलग बजट बना पाते हैं। अगर रोजमर्रा की चीजों पर ज्यादा पैसा खर्च हो रहा हो, तो त्योहारों के लिए बचने वाली रकम कम हो जाती है। इसी वजह से इस साल कई परिवार अपनी खरीदारी की सूची छोटी रख सकते हैं। वे जरूरी चीजों को प्राथमिकता देंगे और महंगे सामान को खरीदने से पहले उसकी जरूरत पर विचार करेंगे।

कपड़े, जूते और फैशन प्रोडक्ट्स रहेंगे पहली पसंद

त्योहारों पर नए कपड़े खरीदने की परंपरा भारतीय परिवारों में काफी पुरानी है। Diwali हो, धनतेरस हो या दूसरे उत्सव, लोग अपने और परिवार के सदस्यों के लिए नए कपड़े और एक्सेसरीज खरीदना पसंद करते हैं। इस साल भी यह परंपरा खरीदारी की योजना में सबसे आगे दिखाई दे रही है। LocalCircles के सर्वे के अनुसार, त्योहारों पर खर्च करने की योजना बना रहे परिवारों में से 72 प्रतिशत कपड़े, जूते और फैशन एक्सेसरीज खरीदना चाहते हैं। इससे पता चलता है कि बजट में सावधानी के बावजूद फैशन से जुड़ी खरीदारी लोगों की प्राथमिकता बनी हुई है।

इसका फायदा कपड़ों की दुकानों, फुटवियर स्टोर, फैशन ब्रांड्स और ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म को मिल सकता है। हालांकि, ग्राहक महंगे ब्रांड की जगह किफायती विकल्प चुन सकते हैं या सेल और डिस्काउंट का इंतजार कर सकते हैं। ई-कॉमर्स कंपनियां भी त्योहारों के दौरान विशेष ऑफर देती हैं। ऐसे में ग्राहक ऑनलाइन और ऑफलाइन कीमतों की तुलना करके खरीदारी कर सकते हैं। लेकिन केवल डिस्काउंट देखकर सामान खरीदना हमेशा सही फैसला नहीं होता। अंतिम कीमत, डिलीवरी चार्ज, रिटर्न पॉलिसी और उत्पाद की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना जरूरी है।

घर के सामान और फर्नीचर पर भी खर्च करेंगे लोग

त्योहारों पर घर की सफाई, सजावट और मरम्मत के साथ नए घरेलू सामान खरीदने का चलन भी रहता है। कई परिवार Diwali से पहले फर्नीचर बदलते हैं, किचन के लिए नए उपकरण लेते हैं या घर को बेहतर बनाने के लिए कुछ जरूरी चीजें खरीदते हैं। सर्वे में 45 प्रतिशत परिवारों ने घरेलू उपकरणों और फर्नीचर पर खर्च करने की योजना बताई। इसी अनुपात में यानी 45 प्रतिशत परिवारों ने यात्रा और छुट्टियों पर खर्च करने की इच्छा भी जताई।

इससे संकेत मिलता है कि त्योहारों का बजट केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है। कुछ लोग घर को बेहतर बनाने पर खर्च करना चाहते हैं, जबकि दूसरे परिवार छुट्टियों में कहीं घूमने जाने को प्राथमिकता दे सकते हैं। हालांकि, महंगे घरेलू उपकरण खरीदने से पहले परिवारों को अपनी वास्तविक जरूरत और बिजली की खपत जैसे पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। इसी तरह यात्रा की योजना बनाते समय टिकट, होटल, स्थानीय परिवहन और खाने का खर्च जोड़कर बजट तय करना बेहतर होगा।

मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स खरीदने वालों को लग सकता है झटका

त्योहारों के दौरान स्मार्टफोन, टीवी, लैपटॉप और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान की बिक्री आम तौर पर चर्चा में रहती है। कंपनियां नए मॉडल पेश करती हैं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म विशेष सेल आयोजित करते हैं। लेकिन इस बार इलेक्ट्रॉनिक्स की खरीदारी को लेकर कुछ दबाव दिखाई दे रहा है। सर्वे में 22 प्रतिशत परिवारों ने मोबाइल फोन खरीदने की योजना जताई, जबकि इतनी ही हिस्सेदारी ने दूसरे कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और गैजेट्स पर खर्च करने की बात कही।

स्मार्टफोन बाजार में बढ़ती मेमोरी चिप की कीमतें भी चिंता का कारण हैं। Counterpoint Research के अनुमान के मुताबिक, फेस्टिव सीजन में स्मार्टफोन की बिक्री की मात्रा सालाना आधार पर 12 प्रतिशत घट सकती है, जबकि कीमतों में बढ़ोतरी के कारण बाजार की कुल वैल्यू 5 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है।

इसका मतलब यह हो सकता है कि कुछ ग्राहक नया फोन खरीदने के बजाय पुराने डिवाइस का इस्तेमाल जारी रखें या कम कीमत वाला मॉडल चुनें। वहीं, जिन्हें नया फोन खरीदना जरूरी है, वे ऑफर और एक्सचेंज डील की तुलना करके खरीदारी कर सकते हैं।

सोना-चांदी महंगे, ज्वेलरी खरीदने में कम दिलचस्पी

भारत में धनतेरस और Diwali के दौरान सोना-चांदी खरीदने की परंपरा है। कई परिवार इसे शुभ मानते हैं, जबकि कुछ लोग आभूषणों को लंबे समय के लिए संपत्ति के रूप में भी देखते हैं। लेकिन कीमती धातुओं की ऊंची कीमतें इस बार कुछ खरीदारों के बजट को प्रभावित कर सकती हैं।

LocalCircles के सर्वे में केवल 6 प्रतिशत परिवारों ने त्योहारों के दौरान ज्वेलरी खरीदने की योजना जताई। यह अनुपात कपड़े, घरेलू सामान और यात्रा जैसे दूसरे खर्चों के मुकाबले काफी कम है।

हालांकि, इस आंकड़े से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि भारत में सोने की मांग पूरी तरह कमजोर हो गई है। सर्वे शहरी परिवारों की खरीदारी की योजनाओं को दर्शाता है और केवल इसी आधार पर देशभर में सोने की कुल मांग का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

महंगी ज्वेलरी खरीदने वाले परिवार इस साल कम वजन के आभूषण, छोटे सिक्के या सीमित बजट के विकल्प चुन सकते हैं। अंतिम फैसला उनकी आर्थिक स्थिति, खरीदारी के उद्देश्य और उस समय बाजार में चल रहे भाव पर निर्भर करेगा।

महंगाई ने क्यों बढ़ाई परिवारों की चिंता?

फेस्टिव खर्च घटने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण महंगाई का दबाव है। जब रोजमर्रा की जरूरतों पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है, तो परिवारों के पास त्योहारों के लिए बचने वाली रकम कम हो सकती है। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी। इसी दौरान खाद्य महंगाई 7.74 प्रतिशत तक पहुंच गई। खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सीधे घरेलू बजट पर पड़ सकता है।

परिवारों के लिए राशन, सब्जियां, दूध और दूसरी जरूरी चीजों पर खर्च कम करना आसान नहीं होता। ऐसे में कपड़े, गैजेट्स या महंगे घरेलू सामान जैसी खरीदारी पर नियंत्रण करना ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बन सकता है।

इसके अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक ने 7 अक्टूबर 2026 को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। ब्याज दरों में बदलाव का असर बैंकों के कर्ज और EMI पर पड़ सकता है, हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव बैंक और लोन की शर्तों के अनुसार अलग होता है। इससे कुछ परिवार बड़ी खरीदारी के लिए कर्ज लेने में सावधानी बरत सकते हैं।

83% परिवार बचत से करेंगे फेस्टिव खरीदारी

इस सर्वे का एक अहम निष्कर्ष यह है कि त्योहारों पर खर्च करने वाले अधिकतर परिवार अपनी बचत का इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं। सर्वे के मुताबिक, खरीदारी करने वाले परिवारों में से 83 प्रतिशत कुछ न कुछ राशि अपनी बचत से खर्च कर सकते हैं। वहीं, 34 प्रतिशत परिवार अपने फेस्टिव बजट का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा बचत से पूरा करने की योजना बना रहे हैं। इनमें 16 प्रतिशत ऐसे परिवार भी हैं, जो अपनी पूरी फेस्टिव खरीदारी की राशि बचत से खर्च करने की उम्मीद रखते हैं।

यह स्थिति बताती है कि परिवार त्योहारों की खुशियों को बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए अपनी पहले से जमा रकम का सहारा भी ले रहे हैं। बचत का इस्तेमाल करना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जरूरी खर्चों और भविष्य की जरूरतों के लिए पर्याप्त पैसा सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है।

अगर कोई परिवार अपनी बचत का बड़ा हिस्सा त्योहारों पर खर्च कर देता है, तो बाद में मेडिकल जरूरत, शिक्षा, घर की मरम्मत या किसी अचानक आने वाले खर्च को संभालना मुश्किल हो सकता है। इसलिए फेस्टिव बजट बनाते समय जरूरी खर्चों और इमरजेंसी फंड को प्राथमिकता देना समझदारी है।

क्या ऑनलाइन फेस्टिव सेल में बढ़ेगी खरीदारी?

ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म त्योहारों के दौरान ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए बड़ी सेल और विशेष ऑफर पेश करते हैं। इस साल भी ऑनलाइन बाजार में काफी गतिविधि देखने को मिली है। रिपोर्ट के अनुसार, Flipkart की फेस्टिव सेल के दौरान एक समय पर 63 लाख यूजर्स प्लेटफॉर्म पर सक्रिय थे, जबकि Meesho ने अपने सेल के पहले दिन फैशन, ब्यूटी और फेस्टिव डेकोर कैटेगरी में ऑर्डर में सालाना आधार पर 75 प्रतिशत बढ़ोतरी की सूचना दी।

ये आंकड़े बताते हैं कि ऑनलाइन खरीदारी में लोगों की दिलचस्पी बनी हुई है। लेकिन किसी एक प्लेटफॉर्म पर ज्यादा ट्रैफिक या ऑर्डर आने का अर्थ यह नहीं है कि देश के सभी परिवार कुल मिलाकर ज्यादा खर्च कर रहे हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के आंकड़े और पूरे शहरी बाजार के खर्च का सर्वे अलग-अलग चीजें मापते हैं।

ग्राहकों के लिए ऑनलाइन सेल का फायदा तभी है, जब वे अपनी जरूरत के सामान को सही कीमत पर खरीदें। कई बार आकर्षक ऑफर देखकर अनावश्यक सामान खरीद लिया जाता है, जिससे कुल खर्च बढ़ जाता है। इसलिए खरीदारी की सूची पहले बनाना और बजट तय करना उपयोगी हो सकता है।

खुदरा कारोबारियों के लिए क्या है इस सर्वे का मतलब?

त्योहारों का मौसम खुदरा कारोबारियों के लिए साल का महत्वपूर्ण समय होता है। कपड़े, जूते, फर्नीचर, घरेलू उपकरण, मिठाइयां, उपहार और इलेक्ट्रॉनिक्स बेचने वाले कारोबारियों को इस दौरान अधिक बिक्री की उम्मीद रहती है।

लेकिन यदि ग्राहक अपने खर्च में सावधानी बरतते हैं, तो दुकानदारों को अपनी बिक्री रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। किफायती उत्पाद, छोटे पैकेज, सही कीमत और उपयोगी ऑफर उन ग्राहकों को आकर्षित कर सकते हैं, जो बजट के भीतर खरीदारी करना चाहते हैं।

सर्वे में कपड़े और फैशन को सबसे ज्यादा प्राथमिकता मिलने से इस क्षेत्र के कारोबारियों को मांग का अच्छा संकेत मिल सकता है। दूसरी ओर, महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स और ज्वेलरी जैसे उत्पादों में ग्राहकों की सावधानी को देखते हुए कंपनियों को कीमत और ऑफर पर ज्यादा ध्यान देना पड़ सकता है।

हालांकि, यह अनुमानित खर्च है, वास्तविक बिक्री का अंतिम आंकड़ा नहीं। त्योहारों के दौरान मिलने वाले ऑफर, वेतन, बाजार की कीमतें और ग्राहकों की जरूरतें वास्तविक खर्च को बदल सकती हैं।

त्योहारों की खुशियां रहेंगी, लेकिन बजट पर होगी ज्यादा नजर

LocalCircles के सर्वे के मुताबिक, 2026 में शहरी भारत का फेस्टिव खर्च 6 प्रतिशत घटकर ₹1.97 लाख करोड़ रहने का अनुमान है। औसतन परिवार करीब ₹20,000 खर्च कर सकते हैं, लेकिन 31 प्रतिशत शहरी परिवार गैर-जरूरी खरीदारी न करने की योजना बना रहे हैं। कपड़े, जूते और फैशन प्रोडक्ट्स सबसे लोकप्रिय खरीदारी बने हुए हैं, जबकि घरेलू सामान और यात्रा भी लोगों की योजनाओं में शामिल हैं।

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महंगाई, बढ़ती खाद्य कीमतें और कर्ज की लागत ने परिवारों को अपने खर्च पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रेरित किया है। वहीं, 83 प्रतिशत खरीदारी करने वाले परिवारों का बचत पर निर्भर रहना बताता है कि त्योहारों की खरीदारी को पूरा करने के लिए पहले से जमा रकम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।कुल मिलाकर, इस साल का फेस्टिव सीजन खरीदारी से पूरी तरह दूर रहने के बजाय सोच-समझकर खर्च करने का संकेत देता है। परिवार त्योहार मनाएंगे, लेकिन  उनकी प्राथमिकता जरूरत, कीमत और बजट के बीच संतुलन बनाए रखना होगी।

डिस्क्लेमर: यह लेख LocalCircles के Mood of the Consumer सर्वे और प्रकाशित समाचार रिपोर्टों में उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। ₹1.97 लाख करोड़ का आंकड़ा परिवारों की बताई गई खर्च योजनाओं से निकाला गया अनुमान है, वास्तविक खर्च का अंतिम आंकड़ा नहीं। सर्वे के नतीजे सभी परिवारों के व्यवहार का सटीक प्रतिनिधित्व नहीं करते। आर्थिक आंकड़े और बाजार की स्थिति समय के साथ बदल सकते हैं।

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